[दैनिक जागरण में 'हम सब भी कम गुनहगार नहीं' शीर्षक से 26-08-2013 को प्रकाशित]यौनहिंसा के सबसे घृणित रूप सामूहिक बलात्कार ने एक बार फिर से देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है. इसबार चोट शायद और भी गहरी है क्योंकि मुंबई आमतौर पर महिलाओं के लिए सुरक्षित शहर रहा है और अगर कुछ वर्ष पहले ताज होटल के सामने नववर्ष की पूर्व संध्या पर हुई वारदात जैसी घटनाएँ नियम नहीं अपवाद ही रही हैं. इस बार के दंश और गहरे इसलिए भी हैं क्योंकि आमतौर पर पत्रकारों से डरने वाले अपराधियों ने इस बार एक युवा पत्रकार को ही निशाना बनाया है.
अब तक आई सूचनाओं के मुताबिक अपने
साथी के साथ एक खबर पर काम करने निकली आत्मविश्वास से भरपूर उस युवा पत्रकार को
कुछ यौनकुंठित पुरुषों ने रोक. उनका झगड़ा हुआ और फिर उन्होंने लड़की के साथी
पत्रकार को बुरी तरह से मारपीट कर कब्जे में करने के बाद युवती का सामूहिक
बलात्कार किया. ठीक वैसे जैसे दिल्ली में हुआ था. उन्हें किसी का कोई भय नहीं था.
शायद इसलिए क्योंकि वे इसके पहले तमाम कमजोर स्त्रियों के साथ यह कर चुके होंगे.
अगर वह बलात्कार तक न भी पंहुचे हों तो उन्हें याद होगा कि उन्हें कभी किसी ने
मौखिक यौन हिंसा से नहीं रोका. भीड़भाड़ वाली जगहों पर स्त्रियों के शरीर पर फिरते
उनके हाथों को रोकने की जगह समाज ने उनकी यौनहिंसा को छेड़छाड़ का नाम दिया मानो
उनकी शिकार स्त्रियाँ भी उनके कुत्सित आनंद में शामिल हों.
तब क्या मान लिया जाय कि दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुई निर्मम सामूहिक बलात्कार और हत्या की
घटना से उठे जनप्रतिरोध का का कोई असर नहीं हुआ है? यह भी कि हुक्मरानों ने उस
गुस्से को वक्ती मान कर बस ज़ुबानी जमाखर्च किया था और यौन अपराधी जानते हैं कि महिलाओं
की सुरक्षा के उनके सारे वादे झूठे थे? अफ़सोस कि उनके दावे जैसे भी हों जमीनी
हकीकत यही है. पर इस जमीनी हकीकत के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या वह समाज जिससे यह
अपराधी आते हैं दोषमुक्त माना जा सकता है?
नहीं, इसके लिए हम सब दोषी हैं,
हम सब जिम्मेदार हैं. सोचिये तो कि इस घटना से चन्द रोज पहले ही भारत पढने आई एक
अमेरिकी छात्रा के सिहरा देने वाले यात्रा वृत्तांत ने हमारे समाज का कैसा यौन
कुंठित खाका पेश किया था और हममें से ज्यादातर को असर तक नहीं पड़ा था? इसलिए कि वह
‘गोरी विदेशी’ थी ‘अन्य’
थी? यह भी याद करिए कि अभी चंद रोज
पहले ब्रिटेन सरकार द्वारा भारत यात्रा पर जाने वाली अपनी नागरिकों को दो सलाहें
दी थीं. यह कि उन्हें समूह में रहने पर भी यौन हिंसा के खिलाफ बहुत सतर्क रहना
चाहिए और दिन में भी अकेले नहीं निकलना चाहिए. हमारे समाज के मूल चरित्र को आइना
दिखाती हुई यह सलाह भी हमें जगा नहीं सकी थी. और हाँ, इसे औपनिवेशिक रंगभेद कहके
खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि इसके पीछे दिल्ली में स्विस राजनयिक के साथ हुए
बलात्कार से लेकर आगरा में विदेशी युवती के कमरे में उसके होटल का मालिक के घुस
आने जैसे कड़वे सच हैं.
अगर विदेशों का नाम सुनते ही
बहुसंख्यक भारतीय पुरुषों के दिमाग में आने वाले ‘मुक्त सेक्स’ के ख्याल की नजर से
देखें तो विदेशी स्त्रियों के साथ आम भारतीय व्यवहार की यह कुंठा बहुत सहज जान
पड़ेगी. पर सवाल यह है कि क्या हमारे समाज में व्याप्त यौनकुंठा का शिकार केवल विदेशी
और इसलिए ‘अन्य’ स्त्रियाँ ही होती हैं. उत्तर साफ़ है कि नहीं. देविपूजन करने
वाले, मातृभूमि को ‘माँ’ रूप में देखने वाले इस समाज की दमित इच्छाएं अपनी या
पराई, किसी स्त्री को नहीं छोड़तीं.
दुःख होता है पर मानना पड़ेगा कि
आम भारतीय पुरुष के मानस में स्त्री के केवल तीन रूप है, प्राप्य, वांछनीय और
उल्लंघनीय. बेशक लोग ऐतराज कर सकते हैं कि परिवार की स्त्रियों, खासतौर पर माँ इन
तीनों में नहीं आएगी पर वहां एक सवाल बनता है. पर सिर्फ यह पूछें कि पिताओं के
मौखिक या शारीरिक गुस्से का शिकार होती माँ के पक्ष में कितने बेटे, कितने देवर
खड़े होते रहे है और यह तर्क ध्वस्त हो जाएगा. सामाजिक परिधि पर खड़े वेश्यालयों में
सीधी यौन हिंसा झेलने से लेकर चाय-अंडे की रेहड़ी पर काम करते हुए कुत्सित मजाकों
का शिकार होती स्त्रियों को याद करें और साफ़ समझ आ जाएगा कि उपलब्ध स्त्रियाँ कौन
हैं.
उल्लंघनीय स्त्रियों के बारे में
तो शायद वह स्पष्टीकरण भी नहीं चाहिए. यह समाज सामंतों के घर से होकर अपने पति के
घर पंहुचने वाली ऐसी पीड़िताओं के इतिहास से ही नहीं बल्कि प्रतिरोध के दुस्साहस के
जुर्म में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई भंवरी देवियों के वर्तमान से भी भरा हुआ
है. फिर हम चाहे मथुरा को याद करें या खैरलांजी में हुए बर्बरतम अपराध को, साफ़
दिखता है कि सामन्तवाद से लोकतंत्र में चले आने के बावजूद स्त्रियों, खासतौर पर
कमजोर वर्गों की स्त्रियों को लेकर, सामंती सोच वहीँ खड़ी है.
यौनकुंठित पुरुषों, दुर्भाग्य से
जो हमारे समाज का बहुमत हैं, कि नजर में ‘वांछनीय’ स्त्रियों का तीसरा वर्ग है. यह
वही वर्ग है जिसके प्रति पुरुष कुंठा को लेकर बाजार सिनेमाघरों के धुंधले अंधेरों
की फंतासियों से लेकर टायर तक बेचने के अपने खेल खेलता है. दिक्कत यह है कि अपने
सुरक्षाघेरों में चलने वाला यह वर्ग पुरुषों की नजर में प्राप्य वर्ग को और
प्राप्य और उल्लंघनीय वर्ग को और उल्लंघनीय बना देता है. वैसे भी ‘लड़की हंसी तो
फंसी’ के सहजबोध वाले समाज में प्राप्य और उल्लंघनीय के बीच की सीमा बहुत पतली
होती है. जेएनयू जैसे प्रगतिशील विश्विद्यालय में हुई हालिया घटना इस बात की गवाह
है कि आतुर पुरुष के किसी भी व्यवहार का प्रतिरोध स्त्रियों को उल्लंघनीय बना देता
है.
हम जो भी चाहें, यह घटनाएँ तब तक
नहीं रुकेंगी जबतक हम हर ऐसी घटना पर नहीं उबल पड़ते. याद करिए कि अभी भंडारा जिले
में तीन नाबालिग दलित बच्चियों के संदिग्ध बलात्कार के बाद हत्या कर दी गयी थे. यह
भी कि हर आदिवासी मथुरा के लिए बरक्स एक नैना साहनी मिलेगी और हर दलित बस्ती की
स्त्रियों के ऊपर हुई यौनहिंसा के बरक्स मुंबई के ताज होटल से नववर्ष की
पूर्वसंध्या मना कर निकलती स्त्रियों पर हमला करने वाली भीड़ खड़ी होगी. और हाँ, यह
भी कि यह भीड़ का अपना कोई चरित्र नहीं होता, इसमें मजदूरों से लेकर ‘उच्चवर्गीय’
पेशेवरों तक कोई भी हो सकता है. यकीन न हो तो पिछले साल जुलाई में भारत सरकार की
तरफ से चीन भेजे गए उस युवा प्रतिनिधिमंडल दल को याद करिए जिसके यौनदुर्व्यवहारों
से तंग होकर उसके होटल से बाहर निकलने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया गया था.
यह भी कि हम जब तक इस हिंसा से
उपजी शर्म और कलंक का व्याकरण पीड़िता से बदल कर अपराधियों तक नहीं ले जायेंगे तब
तक कुछ नहीं बदलेगा. वे यह जानकार यौनहिंसा करते रहेंगे कि उनके अपराधों की शर्म
उनके शिकारों के शरीर और आत्मा पर दर्ज होगी, वे उन्मुक्त घूमते रहेंगे जैसे चीन
वाला प्रतिनिधिमंडल घूम रहा है. इसीलिए जरुरत है कि न केवल ऐसे हमले को झेलकर भी
शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत करने वाली उस युवा दोस्त के साथ खड़े हों बल्कि
यौनहिंसा के खिलाफ सहनशीलता पूरी तरह से ख़त्म करें. बेशक यह उस समाज में बहुत ही
मुश्किल है जिसमे राज्यसभा के उपसभापति तक पर बलात्कार के आरोप हों और सांसदों के
तमाम विरोध के बावजूद वह अपने पद पर जमा हुआ हो. पर इसीलिए यह बेहद जरुरी भी है.
इसीलिए यह भी बहुत जरुरी है कि हम सार्वजनिक जगत में महिलाओं, खासतौर पर
मध्यवर्गीय और सर्वहारा महिलाओं की उपस्थिति बढ़ाएं. यह मछली बेचने से लेकर ऑफिसों
में काम करने वाली स्त्रियों तक की मुम्बई की सड़कों पर उपस्थिति थी जो मुंबई को सुरक्षित
बनाती थी. अपनी इस बहादुर दोस्त से माफी मांगने के लिए जरुरी है कि हम यह जगह
उन अपराधियों से वापस छीन लें.
हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} की पहली चर्चा हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती -- हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल चर्चा : अंक-001 में आपका सह्य दिल से स्वागत करता है। कृपया पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें | आपके नकारत्मक व सकारत्मक विचारों का स्वागत किया जायेगा | सादर .... Lalit Chahar
ReplyDeleteहिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} किसी भी प्रकार की चर्चा आमंत्रित है दोनों ही सामूहिक ब्लौग है। कोई भी इनका रचनाकार बन सकता है। इन दोनों ब्लौगों का उदेश्य अच्छी रचनाओं का संग्रहण करना है। कविता मंच पर उजाले उनकी यादों के अंतर्गत पुराने कवियों की रचनआएं भी आमंत्रित हैं। आप kuldeepsingpinku@gmail.com पर मेल भेजकर इसके सदस्य बन सकते हैं। प्रत्येक रचनाकार का हृद्य से स्वागत है।
ReplyDeleteमनोवैज्ञानिक यह कहते हैं कि बलात्कारी केवल शारीरिक आकर्षण के वशीभूत हो यौन सुख पाने के लिए ही बलात्कार नहीं करता बल्कि उसे महिला को तडपते देखकर सेडिस्टिक प्लेजर का अनुभव होता है।वह महिला को सबक सिखाना चाहता है कभी महिला होने के कारण तो कभी दलित होने के कारण ।जाहिर है कि समाज में किसी भी स्तर पर भेदभाव है तो कमजोरों पर अत्याचार होता रहेगा।उपरी उपाय जैसे ये उम्रकैद मृत्युदण्ट या पोर्नोग्राफी आदि पर रोक कुछ खास राहत नहीं दे पाएंगें।
ReplyDeleteसमर जी,अभी आपका लेख पूरा नहीं पढा है ।मुझे लगता है इसे फुर्सत में ही पढा जाना चाहिए ।